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Tuesday, August 11, 2015


वर्षा तू 

सौंधी सौंधी सी खुशबू ने 
मन को मेरे महकाया,
तुरंत मैने भांप लिया, यह 
वर्षा का संदेश है आया।

वर्षा तू के आते ही
हो उठते है सबके प्राण खिल,
झरझर झरने लगते बहनें 
कहते, आओ, भूलो सभी मुश्किल।



मुझे भी लगता मै वर्षा में,
झुमू, नाचुं, गाऊ 
आनन - फानन में दौड लगाकर 
वर्षा में भीग कर आऊ।

आओ सभी मिल जुल कर
वर्षा का आनंद उठाये,
ये तू तो देती संदेश नवता का,
हम सभी इसे जीवन में अपनाये । 

-------- माधुरी कुलकर्णी, 
(५ अगस्त २०१५)

Friday, August 24, 2012

हिंदी में प्रथम प्रयास

हिंदी भाषा से परिचय काफी पुराना है | हिंदी फिल्मों के जरिये हो ही जाता है | हिंदी में लिखने का ये मेरा प्रथम प्रयास है | आशा है के पाठक इसे पसंद करेंगे | फिल्मों की बात निकली है तो क्यूँ न फिल्मों के बारे में ही बोला जाये? इस पोस्ट के लिए मुझे प्रेरणा दीप के ब्लॉग से मिली |  जिस सरलतासे दीप हिंदी तथा अंग्रेजी इस दो भाषाओँ लिखती है वो वाकई प्रशंसा के लायक है | उसकी आखरी पोस्ट फिल्मों के बारे में थी | ऐसी फिल्में जो दिल को छू जाये | जिन्हें देखकर कुछ सीखने को मिलें | जिनके किरदारों को कॉपी करने का दिल करे | ऐसी कई  फिल्में आज तक  बनी  हैं |  बावर्ची उन्ही में से एक है | मुझे सबसे ज्यादा पसंद मूवीज में से एक है | राजेशजीने निभाया हुआ रघु का किरदार जीवन सही ढंग से जीने की तरकीब बताता है | एक उलझे, बिखरे परिवार को रघु के बदौलत सहारा मिलता है | सहारा, कोई पैसों का सहारा नहीं है बल्कि भावनिक सहारा है | रघु परिवार के सारे लोगों को एक दुसरे से जोड़ता है| क्यूँ की दरारे तो सिर्फ गलतफहमी की वजह से थी | इतना ही नहीं पर वो उन्हें ये भी सिखाता है के कैसे  छोटी छोटी खुशियाँ जिंदगी में ढूंडकर उनसे आनंद पाया जा सकता है | इस फिल्म का एक वाक्य मुझे सबसे ज्यादा भा गया : इंसान किसी बड़ी ख़ुशी के इंतज़ार में न जाने कितनी छोटी छोटी खुशियों को महसूस नहीं करता| ये काफी हद तक सच भी है| हमारे लिए जीवन के उद्देश तय होते हैं | जब तक हम वो हासिल न कर लें हमें चैन और सुकून नहीं होता | इस दौरान आ चुकी  कई  छोटी छोटी खुशियों को हम नजरअंदाज कर देते  हैं 
और एक बात जो हम अक्सर भूल जाते है वो है परिवार के सदस्यों का महत्व | खुद के लिए तो जीना हर कोई जानता है पर औरों को खुश करने में जो मजा है वो और कहीं नहीं | इस बात पर मैंने भी गौर किया हैं के सचमे काफी ख़ुशी मिलती है अगर मैं किसी और को थोड़ी मदद कर दूँ तो | इस "और" में परिवार वालें तो होने ही चाहिए पर पडोसी, सहकर्मी भी हो सकते हैं | जब भी मैं बावर्ची देखती हूँ, इस बात का मुझ पर  कई दिनों तक असर रहता है| हाँ, हमेशा के लिए असर करना तो किसीभी तरह के मीडिया को संभव नहीं है | जब कोई दिल को चोट पहुंचा दे तो असर गायब हो जाता है | नॉर्मलसी बात है | 
बहुत कुछ लिखने का मन कर रहा है पर सोचती हूँ अगले पोस्ट के लिए बचाके रखूं |  नेक्स्ट पोस्ट में भी फिल्मों की ही बातें होंगी |